Sunday, September 8, 2013

"इज्ज़तों" से बढ़कर तो और कुछ नहीं होता

इज्ज़तों से बढ़कर तो और कुछ नहीं होता
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इज्ज़तों से बढ़कर तो और कुछ नहीं होता...
चाहतों की डोरी को,
तोडना ही पड़ता है...
मंजिलों की कश्ती को,
मोड़ना ही पड़ता है...
भूलना ही पड़ता है,
खुद से प्यारे लोगों को...
और दिल के आंगन में,
नक्श उनकी तस्वीरें....
कुछ हसीन लफ़्ज़ों की,
कुछ हसीन तहरीरें...
पांव जिन में जकड़े हो,
उन सभी जंजीरों को,
खोलना ही पड़ता है....
खूबसूरत आंखों में,
बसने वाले ख्वाबों को,
नोचना ही पड़ता है....
दिल से मिलता हर रिश्ता,
तोडना ही पड़ता है.....

क्यूं के,

"इज्ज़तों" से बढ़कर तो और कुछ नहीं होता...

------------- अज्ञात.

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