Friday, June 6, 2014

हिंसक समाज

इसमें कोई शक नहीं कि हम हिंसक समाज है. हमारी धार्मिक भावनाएं इतनी हल्की चीज़ है कि किसी भी सरफिरे की टुच्ची हरकत से आहत हो जाती है. फिर हम निकल पड़ते हैं रक्त-स्नान करने. मोहसिन को किन्हीं राजनेताओं के स्वार्थ ने नहीं मारा है. उसे मारा है हम लोगों ने. हम ही है वो लोग जिनके अन्दर खून के प्यासे भेडिये छुपे बैठे हैं. हमारे अन्दर छुपी इसी रक्त-पिपासा का हाकिम लोग फायदा उठाते हैं. उन्हें कुछ नहीं करना होता. बस हमारे अन्दर छुपी दुनिया फूंक डालने की हसरत को हल्की सी हवा देनी होती है बस. बाकि विनाश की पटकथा तो हम खुद ही लिख लेते हैं. और ऐसी उम्दा कि सृष्टि की संहारक शक्तियां भी शर्मिंदा हो जाए. बच्चियों का रेप कर देते हैं, बूढों के गले में टायर डालकर आग लगा देते हैं, नौजवानों को चाकुओं से गोद गोद कर किसी और का बदला किसी और से ले लेते हैं. और ये सब किसलिए ? क्यूँ कि किसी सरफिरे ने कोई ऐसी हरकत कर दी जिससे हमारे धर्म पर आंच आ गई. कितना वाहियात है ये मजहबी पागलपन ? इस्लाम को तो खैर आदत थी ही हमेशा खतरे में रहने की अब हिंदुत्व भी डेंजर जोन में आया मालूम होता है. और जब जब आस्थाओं पर खतरा मंडराता है खून की होली खेलना जरुरी हो जाता है. और कमाल की बात ये कि इस खून-खराबे में शामिल लोग किसी फिदायीन ग्रुप के नही होते, किसी आत्मरक्षा बल के सदस्य नहीं होते. ये होते है हम जैसे ही लोग जो अपना दुनिया जहान का फ्रस्ट्रेशन किसी की जान लेकर निकालते है.
देख लीजियेगा, अगर मोहसिन के हत्यारे पकडे गए तो वो हम जैसे ही लोग निकलेंगे. सीधे-साधे आम लोग. उनमे से कोई ऐसा भी होगा जो अपनी बीवी की ऊँगली किचन में कटी देखकर बदहवास हो जाता होगा लेकिन मोहसिन पर हॉकी-डंडे चलाते वक्त जिसका दिल ना पसीजा. कोई ऐसा भी होगा जो माँ का आशीर्वाद लिए बगैर घर से नहीं निकलता होगा लेकिन किसी और माँ की आँख के तारे को मिटाते वक्त जिसने एक पल ना सोचा. वो लोग जो रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मक्खी मारने तक की सलाहियत नहीं रखते धर्म के नाम पर यूँ क़त्ल कर आते हैं जैसे इससे आसान कुछ ना हो. इतनी नफरत, इतनी घृणा कैसे जनरेट कर लेता है धर्म ? इकबाल पर हंसी आती है जो कहता था 'मजहब नहीं सीखाता आपस में बैर रखना.' दरअसल मजहब ही सीखाता है आपस में बैर रखना. धर्म की रक्षा के नाम पर प्राण लेने को उकसाता है. आज कोई मोहसिन मरा है हिन्दू धर्म की मूंछ नीची होने से बचाये रखने के लिए, कल कोई मोहन कुर्बान हो जाएगा इस्लाम की इज्जत का झंडा संभालते संभालते. हम भयंकर किस्म की प्रजाति है इस ब्रहमांड में. अब तो शर्म भी नहीं आती खुद पर. बस दिमाग में एक खालीपन सा घूमता रहता है. ज़हन को खुद के मुजरिम होने का अहसास कचोटता रहता है.
हम सब गुनाहगार है मोहसिन के. हर उस शख्स के जो बिना वजह मारा गया. चाहे 1984 में दिल्ली में, चाहे गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में, चाहे उसके बाद के गुजरात नरसंहार में या हालिया मुजफ्फरनगर में. हर वो शख्स जो धार्मिक उन्माद की बलि चढ़ गया उसका खून हमारे सर पर है. सच सच बताइये क्या हमें इंसान कहलाने का हक अब भी है ?

( सन्दर्भ :- पुणे में मोहसिन शेख नामक युवक की भीड़ द्वारा की गई हत्या )

Thursday, June 5, 2014

क्या बहुत जरुरी था...??

क्या बहुत जरुरी था...??
ख्वाब-पोश आँखों में,
आंसुओं का भर जाना...
हसरतों के साहिल पर
तितलियों का मर जाना...
हब्स की हवाओं में,
खुशबुओं का डर जाना...
दिल के गर्म सहरा में,
हशर ही बरपा होना...
दर्द ला-दवा होना
क्या बहुत जरुरी था...???
यूँ तेरा जुदा होना...!!!
यूँ तेरा जुदा होना...!!!
--------- अज्ञात.

Tuesday, June 3, 2014

जब टाईफॉइड को मुझ से प्यार हुआ.

जिंदा है.. अभी जिंदा है हम....
इसलिए टेंशन नहीं लेना का भाई लोग...
आपसे हमारी दो हफ़्तों की जुदाई हमें भी बहुत खली है दोस्तों..
और इस जुदाई के पीछे जिस वजह का हाथ था उसका नाम है टाइफाइड... कमबख्त नाम ही ऐसा है के कंपकंपी छूट जाती है. इस नामुराद बीमारी ने हमें इतना परेशान किया कि हम अल्लाह मियाँ से रूबरू मिलते मिलते रह गए. शायद फेसबूकी पापों की सजा अभी यही भुगतने का रिवाज हो. पूरे सात दिन हॉस्पिटल में लिटाये रखा इस नासपीटे टाइफाइड ने. बेहोशी में डूबते-उतराते हम सुनते रहें कि डॉक्टर लोग घरवालों से कुछ क्रिटिकल क्रिटिकल कर के बोल रहे थे. कहते है कि अंतिम समय की आहट मिलने पर लोगों के सामने उनके पापों का लेखा-जोखा घूमने लगता है. हमारे सामने हमारे वो सारे फेसबुक स्टेटस घूम गए जिसमें हमने तरह तरह के लोगों को सींगों से पकड़ा था. हम तो डर गए कि बिना किसी उद्घोषणा के ही विदा होना पड़ेगा. एक रात तो अल्लाह मियां खुद हमारे सपने में आये और कहने लगे, 'चलने का इरादा है क्या ?' हम बोले ऐ अल्लाह अभी तो हमने अच्छे दिनों का ट्रेलर भी नहीं देखा. अभी से ये दावतनामाँ क्यूँ ? मेरा तो फेसबुक ही विधवा की मांग की तरह सूना हो जाएगा मेरे बगैर. अल्लाह मियां मुस्कुराए और बोले कि जाओ, कुछ और महीने ग़दर काटो फेसबुक पर. इन कुछ महीनों वाली बात का पेंच हम समझ तो गए थे लेकिन उस वक्त नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर समझा. कहीं अल्लाह मियां का इरादा बदल जाता तो ?
तो इस तरह से हम जान तो बचा लाये लेकिन रूह के पिंजरे को क्षतिग्रस्त होने से नहीं बचा पाये हम. एयर रेड में ध्वस्त इमारत की तरह होकर रह गए हैं हम. वेट सेंसेक्स की तरह नोज-डाईव लगाकर 47 से सीधा 39 पर आ गया है. चेहरे की चमक तो महीनों चवनप्राश खाकर भी शायद ही लौटे. हद तो तब हो गई जब हमसे मिलने आई एक आंटी हमारे गालों के डिंपल्स को देखकर बोली कि आय हाय कैसे गड्ढे पड़ गए हैं. जी में आया हाथ में पकड़ा हुआ सूप का बाउल आंटी के सर पर पलट दे.
बुखार तो हम पर इस तरह कब्ज़ा जमाये रहता था जैसे वो रोबर्ट वाड्रा हो और हम गुडगाँव की ज़मीन. हमें 'हॉटेस्ट गर्ल ऑन प्लैनेट' का खिताब दिलाने की फिराक में मालूम पड़ता था कमबख्त. हमने उससे कहा भी कि माना 'हॉट गर्ल' होना आजकल फैशन में है लेकिन ऐसा भी क्या कि करीम होटल के तंदूर को काम्प्लेक्स दिया जाए ? लेकिन वो फिर भी नहीं माना. डीजल के दामों की तरह ऊपर ही ऊपर जाता रहा. नीचे उतरने का नाम ना लिया ससुरे ने..
अजीब अजीब रंगों और आकार प्रकार की दवाएं खाते खाते मुंह ओवैसी-तोगड़िया जैसे भाई लोगों की जुबान से ज्यादा कड़वा हो गया है. लिक्विड डाइट पर रहते रहते हम ये भी भूल चुके हैं कि रोटी होती किस शक्ल की है. हमें तो दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हुई अभी तक. ऊपर से हमरी अम्मा हमें बिस्तर से उठने ही नहीं देती. ना ही कोई किताब पकड़ने देती है. हमारा कई बार जी चाहा कि रातों को उठकर अपने कंप्यूटर से लिपट कर रो लें. पर वो भी मुमकिन ना हो सका.
खैर, अब सूरतेहाल ये है कि रिकवर कर रहे हैं. आहिस्ता आहिस्ता फिर से जलवा बिखेरेंगे आप सब अजीजों के साथ. आप लोगों ने मेरी गैर-मौजूदगी में अपनी फ़िक्र जताते मेसेजेस से मेरा इनबॉक्स भर दिया है. उसके लिए मैं आप सब की कर्ज़दार हूँ. और हाँ, आज कई दिनों बाद ये सब लिखते हुए मैं मुस्कुराई हूँ.
शुक्रिया आप सबका....
शायर खुशबीर सिंह 'शाद' से एक सवाल उधार लेकर पूछती हूँ कि,
"एक हिजरत जिस्म ने की, एक हिजरत रूह ने
इतना गहरा जख्म आसानी से भर जाएगा क्या ?"

Wednesday, May 14, 2014

इश्क का ज़ज्बा

इश्क का वो जज्बा जो सब के अन्दर है
मुझ मे उस जज्बे का एक समन्दर है...
------ ज़ारा.
14/05/2014.

Tuesday, May 13, 2014

हवा-हवाई

बच्चों का मनोविज्ञान समझने में कुछ एक ही बॉलीवुडीया निर्देशक कामयाब रहे हैं. अमोल गुप्ते यकीनन उनमे से एक है. तारे ज़मीन पर जैसी कमाल फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्शन के बाद और 'स्टैनली का डिब्बा' जैसी बेहद खूबसूरत फिल्म के निर्देशन के बाद वो अब हवा हवाई लेकर आये हैं. बालमन की इतनी गहरी समझ हिंदी सिनेमा में दुर्लभ ही है.
हवा हवाई कहानी है अर्जुन हरिश्चंद्र वाघमारे की. एक किसान फॅमिली का बेटा जिसका परिवार मुखिया की मौत के बाद मुंबई के धारावी इलाके में आ बसा है. माँ दूसरे के घरों का काम कर के घर चला रही है. माँ को सपोर्ट करने के लिए अर्जुन एक टी-स्टाल पर काम करना शुरू कर देता है. पहला ही सीन आपको जकड लेता है. अर्जुन की माँ बनी नेहा जोशी का अभिनय उस सीन में ज़बरदस्त है. अपने बेटे को चाय के खोखे पर छोड के जाते वक्त एक माँ की कशमकश उन्होंने बेहतरीन तरीके से व्यक्त की है. खैर, अर्जुन काम करना शुरू करता है और पहले ही दिन उसे पता चलता है की उसके स्टाल के ऐन सामने रात के वक्त बच्चे स्केटिंग की प्रैक्टिस करते हैं. स्केटिंग शूज की रफ़्तार से अभिभूत अर्जुन की आँखों में खुद भी स्केटिंग करने का सपना तैरने लगता है. फिर कैसे वो सपना जूनून बन जाता है, किस तरह उसे मदद हासिल होती है और कैसे वो अपनी मंजिल तलाशने में कामयाब रहता है इसकी कहानी है ये फिल्म.
यूँ तो फिल्म की कहानी बिलकुल सिम्पल है. लेकिन इसे देखने लायक बनाता है इसे निर्देशक द्वारा दिया गया ट्रीटमेंट और कलाकारों का ऑनेस्ट अभिनय. पार्थो गुप्ते अपने हुनर का परिचय स्टैनली का डिब्बा में दे ही चुके है. इस फिल्म में वो और बेहतर तरीके से साबित कर देते हैं कि अभिनय उनके खून में है. अर्जुन के रूप में वो सिर्फ और सिर्फ अर्जुन लगे हैं. एक ऐसे बच्चे की तस्वीर उभारने में वो पूरी तरह कामयाब रहे हैं जिसकी आँखों में तो बेशुमार सपने हैं लेकिन कंधे पर जिम्मेदारियों का बोझ भी है. साकिब सलीम एक बार फिर अपना प्रेजेंस दर्ज करने में कामयाब रहे हैं. 'मेरे डैड की मारुती' जैसी हलकी फुलकी फिल्म में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराने के बाद वो इस फिल्म में स्केटिंग कोच लकी की भूमिका के साथ पूरा न्याय करते नज़र आते हैं. लेकिन शो तो चुराया है अर्जुन के दोस्तों की भूमिका करने वाले बच्चों ने.. गोची, भूरा, अब्दुल और मुरुगन आपको भुलाए नहीं भूलेंगे. हज़ारों रुपयों के स्केटिंग शूज खरीदने में असमर्थ अर्जुन की मदद के लिए वो जो जद्दोजहद करते हैं वो आपको हंसाती भी है और द्रवित भी करती है. सड़कों पर ज़िन्दगी गुज़ारने वाले इन बच्चों में दूसरे की मदद करने का ज़ज्बा देखकर सभ्य समाज को कुछ तो शर्म आएगी जरुर. इन बच्चों के बारे लकी अपने अमेरिकी भाई को लिखता है, "मैं समझता था कि मैं इन बच्चों की ज़िन्दगी बेहतर बना रहा हूँ लेकिन हकीकत तो ये है कि इन बच्चों ने मेरी ज़िन्दगी बदल कर रख दी है. इत्ते इत्ते से बच्चे और ये बड़े बड़े दिल...."
बहुत पहले एक किताब पढ़ी थी सिटी ऑफ़ जॉय.. उसका एक वाक्य अब भी दिमाग में गूंजता रहता है. 'सबसे नीचे के तबकों में ही मित्रता का मोल पहचाना जाता हैं । उनके लिए संसार भर के डॉलरों से एक मुस्कान की कीमत ज्यादा हैं.' इन बच्चों को देखते वक्त अचानक इस लाइन की याद आई.
ये फिल्म मास्टरपीस नहीं है. कुछ कमियाँ इसमें भी है. जैसे कुछ सीन्स में मेलोड्रामा ज्यादा ही हुआ लगता है, ख़ास तौर से क्लाइमेक्स में. संगीत भी उतना अच्छा नहीं है. एकाध गीत को छोड़कर. लेकिन इन कमियों के बावजूद इसे जरुर जरुर देखा जाना चाहिए. और वो भी अपने बच्चों को साथ लेकर. सपने देखने की और उन्हें पूरा करने की कोशिश में जुट जाने की अहमियत जताती ये फिल्म देखने से विमुख न रहिये दोस्तों. वैसे भी एक था टाइगर, चेन्नई एक्सप्रेस, राऊडी राठोड जैसी फ़िल्में देने वाली हमारी फिल्म इंडस्ट्री बहुत कम ऐसी फ़िल्में देती है. इनके निर्माता-निर्देशकों का हौसला बढ़ाना हमारा फ़र्ज़ है. इस शुक्रवार इस फिल्म के बदलने से पहले इसे देखने की कोशिश जरुर कीजियेगा. और खुद को और अपने बच्चों को ये नया और कारगर सबक सिखाइएगा कि,
"कठिन है अगर रस्ता तू फिकर ना कर,
उड़ने की ख्वाहिश में निकल आयेंगे पर..."

Monday, May 12, 2014

गली आगे मुडती है

यूँ तो बनारस की पृष्ठभूमि पर लिखी बहुत सी अच्छी किताबें पढ़ी है लेकिन मेरी फेवरेट शिव प्रसाद सिंह जी की 'गली आगे मुडती है' ही रहेगी हमेशा. काशी का अस्सी से भी ज्यादा पसंद है मुझे 'गली आगे मुडती है.'

पढ़ी है किसी ने ????

Saturday, May 10, 2014

असली राष्ट्रवाद

एक संवाद :
"मैं राष्ट्रवादी हूँ. इस देश के लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ."
"भैया, उसकी जरुरत नहीं है. देश के लिए जान देने का काम जिन्हें सौंपा गया है वो इसे पूरी मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं. बिना कोई शोर-शराबा किये. और वैसे भी तुम्हारे जान देने से होगा क्या ? सिवाय तुम्हारे परिवार पर विपत्ति टूट पड़ने के ? जान-वान देने की जगह तुम कुछ और करो. ऐसा कुछ जिससे ये साबित हो कि तुम अपने मुल्क से, इसके निजाम से बेइंतेहा प्यार करते हो. मसलन अगली बार जब बिना हेल्मेट तुम्हें कोई ट्रैफिक वाला रोके तो उसे पचास का नोट ना पकडाना, बल्कि कानूनन जो जुर्माना हो वो अदा कर देना. या फिर जब खरीदारी करने जाओ तो पक्का बिल लेना ताकि जो टैक्स तुम अदा करो वो देश के कोष में जमा हो. वो जो तुम्हें गुटखा खाकर यहाँ वहां थूकने की आदत है न उसे भी अगर त्याग सको तो सोने पे सुहागा. सड़कें इसी देश की है भाई और उन्हें गन्दा करना कम से कम ऐसे शख्स को शोभा नहीं देता जिसका देशभक्त होने का पुरजोर दावा हो. बाहरी मेहमान आते हैं तो इज्जत देश की ही जाती है. सरकारी ऑफिस में अपनी बारी जल्दी आने के लिए चपरासी को जो सौ का पत्ता पकडाते हो न वो भी एक किस्म का भ्रष्टाचार ही है. और तुमने उसे बढ़ावा देकर उसकी मुखालफत का हक खो दिया है. इस तरह के छोटे मोटे मामलों में रिश्वत का लेन-देन एक भ्रष्ट सिस्टम की नींव है. और इसे हम-तुम ही मजबूत बनाते है....."
".......याद है पिछले चुनाव में वोटिंग वाले दिन तुम सपरिवार पिकनिक मनाने गए थे. बीवी से कहा था के इन तीन-चार वोटों से क्या फर्क पड़ेगा ? तो भैया, इस बार ऐसा न करना. सिस्टम को कोसने का अधिकार हमें तभी है जब हमने इसकी प्रक्रिया में हिस्सा लिया हो....."
"............मेरे भाई, सिर्फ जान देने के नारे लगाने से कोई देशभक्त नहीं बन जाता. देशभक्ति तो इन छोटी छोटी बातों से साबित होगी. अपने देश के लिए मरो नहीं भाई, अपने देश के लिए जियो. इससे प्यार करो. इसमें रहने वाले लोगों से प्यार करो. इसकी संस्कृति, इसकी सभ्यता, इसकी अनमोल विरासत से प्यार करो. तब देखना किसी की हिम्मत नहीं होगी तुम्हारे देशभक्ति के दावे पर ऊँगली उठाने की. मेरी भी नहीं."

जय हिन्द...!!! वन्दे मातरम..!!!