Wednesday, December 18, 2013

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे गलत थे जवाब क्या देते

------- मुनीर नियाजी.

क्या मेरे सिवा शहर में मासूम है सारे

हर जुर्म मेरी जात से मंसूब हुआ है,
क्या मेरे सिवा शहर में मासूम है सारे....??

-------- अज्ञात.

रीढविहीन लोगों में आत्मसम्मान

ये चुनावी मौसम भी जो ना करवाये वो थोडा है...
बताओ तो, दुनिया के चौधरी को धमका दिया...
रीढविहीन लोगों में आत्मसम्मान की ऐसी भावना देख कर आँखें भर आई....

Sunday, December 15, 2013

इतिहास और कुछ नहीं अपराध, मूर्खता और दुर्भाग्य का वृत्तांत भर है

"हिस्ट्री इज अ क्रॉनिकल ऑफ़ क्राइमस, फॉलीज़ एंड मिसफॉर्चयूनस...!"

उर्दू तर्जुमा :-
"तारीख़ जराइम, हिमाक़तों और बदकिस्मती की फ़ेहरिस्त का दूसरा नाम है...!"

हिंदी अनुवाद :-
"इतिहास और कुछ नहीं अपराध, मूर्खता और दुर्भाग्य का वृत्तांत भर है..."

----------------- बशारत मंज़िल से ( मंज़ूर एहतेशाम )

Saturday, December 14, 2013

बशारत मंजिल - मंजूर एहतेशाम

पिछले दिनों एक किताब पढ़ी. मंजूर एहतेशाम की 'बशारत मंजिल.' शुरू शुरू में इस किताब को पढ़ते वक्त थोड़ी बोरियत महसूस हुई. पर जैसा कि मेरी आदत है कि मैं किसी भी किताब को अधूरा नहीं छोडती, मैंने उसे पढना जारी रखा. थोडा आगे जाकर मेरी दिलचस्पी जागृत हुई, थोडा और आगे पढ़कर मुझे उसमे बहुत आनंद आने लगा और किताब ख़त्म होते होते ये किताब मेरी पसंदीदा किताबों की लिस्ट में काफी उंचे स्थान पर विराजमान हो गई. एक बेहतरीन अनुभव रहा इस किताब को पढना.

'बशारत मंजिल' कहानी है एक मुस्लिम खानदान कि तीन से ज्यादा पीढ़ियों के जीवन सफ़र की. ये कहानी है संजीदा अली सोज नाम के एक ऐसे इंसान की जो शायर था, गांधी-भक्त था और साथ ही साथ एक तरक्कीपसंद मुसलमान भी था. ये कहानी है एक ऐसे बड़े भाई की जो अपने छोटे भाई की मकबूलियत को बर्दाश्त ना कर सका और उससे ताजिंदगी नफरत करता रहा. ये कहानी है मुल्ला किफायतुल्लाह की जिनका मानना था कि मजहब एक साथ सलामती से रहने के बजाय दूसरों को ख़त्म करने के बहानों का नाम हो गया है और जब किताबें पढने की बजाय पूजी जाने लगे तो गड़बड़ लाजमी है. ये कहानी दरअसल कहानी है ही नहीं. ये दस्तावेज है उन जिंदगियों का जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई.

ये किताब सच, कल्पना और इतिहास का ऐसा अनोखा मिश्रण है जिसकी सराहना किये बगैर नहीं रहा जा सकता. इस उपन्यास का कालखंड सन 1900 से लेकर 1947 तक का है. ये वो दौर था जब पूरा भारत एक संघर्ष के और बदलाव के दौर से गुजर रहा था. उस ऐतिहासिक कालखंड को हमारी कहानी के किरदारों की नजर से देखना एक दिलचस्प अनुभव है. न जाने कितनी ही ऐतिहासिक महत्त्व की घटनाओं के सन्दर्भ आपको उस दौर के भारत को करीब से समझने में मदद करते है. फिर चाहे वो वलिउल्लाही तहरीक हो, खिलाफत आन्दोलन हो, स्वराज की मांग हो, मुस्लिम लीग की गतिविधियां हो या गांधी जी का भारतीय राजनीति के पटल पर उभरना हो. एक बहुत ही विस्तृत कैनवास पर उकेरी गई खूबसूरत तस्वीर की तरह ये किताब आपकी संवेदनाओं को झकझोर देती है.

एक मुस्लिम खानदान का इतनी बारीकी से चित्रण है इसमें की मुंह से बरबस वाह निकल पड़ती है. वो रिवायतें, वो आदतें, वो तहजीबें और वो हिमाकतें. सब कुछ मौजूद है इस उपन्यास में. भोपाल और दिल्ली शहर का इतनी खूबसूरती से जिक्र है की आप खुद को वहां मौजूद पाते हो. मुझे नहीं पता की ये लेखक की अपनी कहानी है या नहीं. पर लेखक की भाषा और कथानक पर जो पकड़ है उसके जादू से आप बच नहीं सकते. कहानी कहने के मामले में इस उपन्यास को एक नया प्रयोग कहा जा सकता है. और इस प्रयोग को इतनी सफाई से अमल में लाया गया है कि पता ही नहीं चलता कब हकीकत और कल्पना एक दूसरे में घुल मिल गए.

लेखक की धारदार लेखनी एक ही मुद्दे को कई अलग अलग नजरियों से दिखाने में कामयाब रही है. मंजूर एहतेशाम कई विचारधाराओं को अपने किरदारों के माध्यम से एक समान बेरहमी से काटते चले जाते हैं. फिर चाहे वो खोखला राष्ट्रवाद हो, अंधी मजहब परस्ती हो या बेतुका कम्युनिज्म.. सबकी खबर ली है उन्होंने. एक जगह बिरजू नाम का एक दलित किरदार कहता है,
"शर्म से पानी पानी होना एक लक्जरी है जिसे ऊँची ज़ात वाले ही अफोर्ड कर सकते है. कभी सोचा है आपने, इस मुल्क की मिटटी में ही ये तासीर है कि बराबरी का सबक लेकर इस्लाम भी आया, तो अशरफ़, अजलफ़ और अरज़ल में बंट गया."
तो दूसरी तरफ एक और किरदार 'जेहाद का जवाब धर्मयुद्ध' वाली सोच को फटकारता है. इसी तरह कई जगह मंजूर एहतेशाम साहब अतिवाद को धुत्कारते हुए नजर आते है.

इस कहानी के किरदार मेरे ज़हन में रच बस से गए है. अमतुल कबीर, जहांआरा बेगम, बंदा अली खान, अमीना बेगम, गुलबदन, मौलवी किफायतुल्ल्लाह, फरीदा, बिल्लो, बब्बो, ग़जल और ख़ास तौर से जनाब संजीदा अली सोज... हर एक का चरित्रचित्रण इतनी गहराई से किया गया है कि आपके सामने उस किरदार की तस्वीर सजीव हो उठती है. वो दौर, वो हालात, वो जज्बात आप महसूस कर सकते हो और यही लेखक की सबसे बड़ी जीत है.

मुझे हैरानी है की इस किताब को साहित्यिक जगत में कोई स्थान क्यूँ नहीं मिल पाया. इस किताब का जिक्र मैंने कहीं नहीं सुना. या ये मेरी अल्प जानकारी का नतीजा है..? जो भी हो, मेरा मानना है की ये किताब must read तो है ही साथ ही सहेज कर रखे जाने लायक भी है. कम से कम मैं तो इसे अभी कई कई बार पढूंगी.

झूठ ने इस खूबी से अपनी जड़ें मजबूत कर ली

झूठ ने इस खूबी से अपनी जड़ें मजबूत कर ली,
बड़ा मुश्किल हुआ फिर सच को सच साबित करना...

----- ज़ारा.

Wednesday, December 11, 2013

रौशन मिजाज लोगों का, क्या अजब मुकद्दर है

मेरी एक बहुत ही पसंदीदा नज्म उन लोगों को समर्पित जो बिना कोई शोर शराबा किये अपने कर्त्तव्य का निर्वाहन किये जाते हैं. जो बिना किसी स्वार्थ के लोगों में खुशियां बांटते रहते है और बदले में कुछ नहीं मांगते. उनके जज्बे को सलाम...!!!

रौशन मिजाज लोगों का,
क्या अजब मुकद्दर है..
जिंदगी के रास्ते में आने वाले काँटों को,
राह से हटाने में...
एक एक तिनके से,
आशियां बनाने में..
खुशबूएं पकड़ने में,
गुलिस्तां सजाने में,
उमर काट देते हैं...
और अपने हिस्से के फूल बांट देते हैं...
कैसी कैसी ख्वाहिश को,
क़त्ल करते जाते है..
दरगुजर के गुलशन में,
अब्र बनके रहते है..
सब्र के समंदर में,
कश्तियां चलाते है..

ये नहीं के उनको इस,
रोज-ओ-शब की कोशिश का,
कुछ सिला नहीं मिलता...
मरने वाली आसों का,
खून बहा नहीं मिलता...
ज़िन्दगी के दामन में,
जिस कदर भी खुशियां हैं,
सब ही हाथ आती है..
सब ही मिल भी जाती है..
वक्त पर नहीं मिलती
वक्त पर नहीं आती..
यानी उनको मेहनत का,
अज्र मिल तो जाता है..
लेकिन इस तरह जैसे,
कर्ज की रकम कोई
किश्त किश्त हो जाये..
अस्ल जो इबारत हो,
पस-ए-नविश्त हो जाये...
फस्ल-ए-गुल के आखिर में,
फूल उनके खिलते है...
उनके आंगन में सूरज,
देर से निकलते है...

उनके आंगन में सूरज देर से निकलते है....!!!

----------------- अफ़सोस के साथ ये भी अज्ञात.