Wednesday, December 4, 2013

होठों पे हंसी आंख में तारों की लड़ी है

होठों पे हंसी आंख में तारों की लड़ी है
वहशत बड़े दिलचस्प दो-राहे पे खड़ी है

दिल रस्म-ओ-राह-ए-शौक से मानूस तो हो ले
तकमील-ए-तमन्ना के लिए उम्र पड़ी है

चाहा भी अगर हम ने तेरी बज्म से उठना
महसूस हुआ पांव में जंजीर पड़ी है

आवारा-ओ-रूसवा ही सही हम मंजिल-ए-शब में
इक सुबह-ए-बहारां से मगर आंख लड़ी है

क्या नक्श अभी देखिए होते हैं नुमायां
हालात के चेहरे से जरा गर्द झड़ी है

कुछ देर किसी जुल्फ के साए में ठहर जायें
‘काबिल’ गम-ए-दौरां की अभी धूप कड़ी है

--------- काबिल अजमेरी.

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